Thursday, August 17, 2017

मेरी नज्म दरिया से उठा लो

एक नज्म थी 
जो मेरी सोचो से 
निकल कर बह गई 
दरिया में
जी करे तो उठा लेना
पूछ लेना उस से मेरा हाल
कुछ उसको भी सहला देना
भीग कर आई है 
वो कही दूर से
हो गया होगा 
उसको खांसी जुकाम
थोड़ी ताज़ा अदरक की गर्म चाय पिला देना 
एक नज्म 
जो बह गई है 
मेरी सोचो से 
निकल कर
उसको मोहब्बत से 
उठा लेना

किस से करे बात, किसके करीब जाए

बताओ 
किस से 
करे बात
किसके करीब जाए, 
जो तुम नही हो करीब, 
सब हो गए पराये
जो बात तुम में थी
वो अब 
किसी और में
कहाँ से लाये
तुम ही बोलो
किसे छोड़े, 
किसे अपनाये
आज दुनिया 
वीरान सी लगती है
कोई नही है अपना
सबसे नई पहचान सी 
लगती है
तुम्हारे बिना 
जीना कैसा
अब मौत से कहो
मुझे भी 
अपने पास बुलाये
वक़्त है कि 
कटता नही लोगो मे
तुम्हारे बिना 
दिल कहीं लगता नही
अब तुम्ही कहो, 
किस से कहे 
अपना दर्द
किसको अपना 
जख्म दिखाए
बुला लो 
अपने पास मुझे
लगे अपने 
मुझे पराये

बेहतर करके जाओ

दर्द ही दर्द
बिखरा है
हर तरफ
जितना जी चाहे,
उठा ले जाओ
ऐसा जीना भी
कोई जीना है
आओ और यू ही
चले जाओ
पैदा करो
दिल में
कुछ अपनापन
औरों के लिए
कुछ तो
बेहतर करके जाओ

जिंदगी के रंग तुम्हारे बिना अधूरे है

तुम्हारे बिना 
नज़्म लिखू भी तो 
कैसे
एक भी हर्फ 
साथ नही देता..
साथ छोड़ देते हैं 
एहसास..
मेरे पास 
कुछ भी 
नही ठहरता..
खाली  दामन लेकर 
घूमता फिरता हूँ..
हर जगह 
तुम्हे ही 
तलाशता रहता हूँ..
तुम आओ तो 
ग़ज़ल लिखू...
फिर से 
नई जिंदगी मे 
रंग भरु..

मर भी जाउ तो चैन कहाँ

मैं मर जाऊ तो 
कैसे उठेगा 
मेरा जनाजा 
तुम तो हो ही नही 
कौन देगा मुझे कांधा
कौन रोयेगा 
मेरी लाश के पास बैठ कर
कौन भरेगा हिचकिया
तुम तो हो नही
कौन देगा मुझे कांधा
सब आएंगे 
अफसोस जताकर 
चले जायेंगे
कुछ करेंगे 
मेरी पिछली जिंदगी का हिसाब
कुछ चुपके से मुस्कुरायेंगे
तुम तो हो ही नही 
जो सच मे करते 
मेरे जाने अफसोस
सब बस रस्म 
अदा करके चले जायेंगे
चलो अच्छा है
दर्द से नाता टूटेगा
कोई तो होगा 
जो  उस पार मेरे
इंतेज़ार में होगा
मिलेंगे उस से
सब गम 
दोहराये जाएंगे
तुम तो हो ही नही
हम जी के भी 
क्या पाएंगे

स्याही

सुबह सुबह
दर्द की दवात
लेकर चली थी
अपने साथ

तुम्हारी यादें
जो मुझसे टकराई

सारा दर्द
फैल गया
स्याही के साथ

Thursday, August 10, 2017

यादें भी कमाल करती है

बारिश आती है 
तेरी याद 
ले आती है
हर लम्हा 
टपकता सा 
लगता है
रात लंबी होती 
जाती है
बहने लगते है 
यादों के परनाले
छप छप की 
आवाजें आती है
परनाले भी देने लगते है 
अपने होने का अहसास
सांसे आवाज़ करती है 
दिल से होती है 
पुकार तुम्हारी
धड़कने फिसलने लगती है
इन सांसो की 
आवा जाही को
संभालते कब रात 
गुज़र जाती है
सिलसिला थमता ही नही
बारिश बरस बरस के 
थक जाती है
यादें भी कमाल करती है यार